
Formation of Our Universe and Galaxies
दोस्तों हमारा यूनिवर्स 13.8 billion years पुराना है जिसमें trillions galaxies मौजूद हैं। और यह galaxies भी किसी छोटे से यूनिवर्स से कम नहीं है यह भी लाखों लाइट ईयर्स में फैली होती है और billions Star system का घर होती हैं। यूनिवर्स में मौजूद इन trillions galaxies में से एक हमारी Milky Way galaxy भी है। जिसकी , age करीब 13.61 billion years है।
और जो 52, 850 light years की radius में फैली है। जिसमें मोजूद billions Star system’s में हमारा solar system भी मौजूद है। जो बाकी सभी Star system की तरह Milky Way galaxy के centre मैं मौजूद supermassive black hole Sagittarius A को ऑर्बिट कर रहा है।
और जैसे किसी atom का सबसे important हिस्सा उसका nucleus होता है उसी तरह हमारे यूनिवर्स में मौजूद लगभग सभी big structures का elementary part 1 star होता है। एक star या stars ka group मिलकर यूनिवर्स में मौजूद सभी objects and structures को बनाता है example के लिए black hole, neutron star और भी दूसरे कई objects यह सभी stars से ही बनते हैं। और अगर Galaxy की भी बात की जाए तो वह भी कई सारे star systems का एक ग्रुप होती है।

यानी यूनिवर्स को अच्छे से समझने के लिए हमें इन shining Star’s और उन से बनने वाले star system और उनके निर्माण को अच्छे से समझना होगा। पर यहां पर किसी और star system के निर्माण को समझने से अच्छा है कि हम अपने ही star system यानी कि solar system के निर्माण को समझें।
तो दोस्तों आज हम समझेंगे कि कैसे हमारे solar system का निर्माण हुआ? और कैसे हमारी Earth का निर्माण हुआ जो आज हम humans का घर है?
दोस्तों हम इसे काफी डिटेल में समझेंगे इसलिए आखरी तक बनी रहिएगा यह वीडियो काफी knowledgeable होने वाली है।
पर पहले तो मैं आपको बता दूं कि सोलर सिस्टम कोई एक object नहीं है बल्कि यह कई celestial bodies का एक group है। जिसमें हमारा sun उसके चारों ओर घूमते planets उनके Moon’s , asteroids और वह सभी objects शामिल हैं। जो हमारे Star Sun की ग्रेविटी के प्रभाव के अंदर आते हैं।
यहां पर हमें हमारे solar system के formation को समझने से पहले अपने solar system और उसमें मौजूद ऑब्जेक्ट के बारे में समझना होगा?

Formation of the Solar System
Formation of Sun
तो चलीये इसकी शुरुआत हमारे सोलर सिस्टम के सबसे बड़े और solar system के centre में मौजूद Star Sun से करते हैं।
दोस्तों हमारा sun एक classified G type main sequence star है। जिसकी Radius 696,340 km है।जिसे वैज्ञानिकों द्वारा yellow dwarf star भी बुलाया जाता है। पर इसका real colour yellow नहीं बल्कि white है। हमारे sun की age करीब 4.603 बिलीयन ईयर्स है। और इसका surface temperature 5,505 °C है। पर इस के core का टेंपरेचर 15 million degrees Celsius तक होता है।
कोर के टेंपरेचर का इतना ज्यादा होने के कारण ही इसके कोर में मौजूद हाइड्रोजन एटम्स फ्यूज होकर हिलियम न्यूक्लियस में बदल पाते हैं। और इसी fusion reaction के चलते sun और universe के लगभग सभी Star’s nuclear energy को light and heat energy मे बदलते हैं। और चमकते हैं।
जैसा कि हम जानते हैं। की Sun की surface से photons particle को यानी लाइट को earth तक आने में करीब 8 मिनट का समय लगता है। पर यही photons जब fusion reaction के चलते sun के core में produce होते हैं तो core से sun के outer surface तक आने में ही इन्हें करीब 10,000 सालों का समय लग जाता है।

Formation of Planets of the Solar System
Sun के बाद बारी आती है हमारे सोलर सिस्टम में मौजूद planets कि हमारे सोलर सिस्टम में 8 प्लैनेट्स मौजूद हैं जिनमें से चार smaller Rocky planets है। जिनमे Mercury, Venus, Earth और ,Mars, शामिल है। इसके अलावा बचे चार planets मैं से Jupiter and Saturn दो gas giants है और Uranus and Neptune दो ice Giants है।
Planets के बाद बारी आती है हमारे सोलर सिस्टम में मौजूद Moon’s की तो हमारे सोलर सिस्टम Mercury and Venus को छोड़ सभी 6 planets के पास अपने Moon’s मौजूद हैं। जिसमें Earth के पास एक Moon है Mars के पास दो Moon’s है Jupiter के पास 79 moons है और Saturn के पास हमारे सोलर सिस्टम के सबसे ज्यादा 82 moons है। इसके अलावा Uranus के पास 27 moons है। और हमारे सोलर सिस्टम के आखिरी ग्रह Neptune के पास 14 moons है।
इनके अलावा हमारे सोलर सिस्टम में dozens of smaller dwarf planets और लाखों एस्ट्रॉयड मौजूद है। जो अलग-अलग दूरी पर हमारे सोलर सिस्टम में एक बेल्ट के रूप में फैले हुए हैं। और हमारे sun को ऑर्बिट कर रहे हैं।
इसी तरह हमारे सोलर सिस्टम में करीब 4 regions बने है।
1. Asteroid belt
2. kuiper belt
3. scattered disc
4. Oort cloud

Formation of Asteroid Belt
जिनमें सबसे पहला नंबर आता है Asteroid belt का
यह एक ऐसा region है जो Mars and Jupiter planet के बीच मौजूद है। एक अनुमान के मुताबिक इस एस्टेरॉइड बेल्ट में करीब 1.1 से 1.9 million asteroids मौजूद हो सकते हैं। जिनमें से ज़्यदातर काफी छोटे हैं पर इनमें से कुछ का diameter 1 kilometer या उससे भी बड़ा है।
Formation of Kuiper Belt
इसके बाद नंबर आता है। kuiper belt का
kuiper belt भी ज्यादातर Rocky asteroids से मिलकर बनी है। जिसकी शुरुआत हमारे सोलर सिस्टम के last known planet Neptune से 55 AU (Astronomical Unit) बाद होती है। यहां पर Astronomical Unit यानि AU दूरी को नापने की एक measuring unit है। जिसमे AU का मतलब sun और earth के बीच की दूरी है। यानि 1 AU बराबर 150 million kilometers है।
kuiper belt हमारे सोलर सिस्टम में करीब 100 AU तक फैली है … जिसके बाद शुरुआत होती है। scattered disc की यह हमारे सोलर सिस्टम का एक ऐसा हिस्सा है जहां पर हमारे sun की लाइट एंड रेडिएशन ना के बराबर पहुंचते है जिसके कारण solar system के इस region में ज्यादातर बड़ी संख्या में ice Comets and frozen gases मौजूद है।
scattered disc हमारे सोलर सिस्टम में करीब 600 AU तक फैली है जिसके बाद शुरुआत होती है हमारे सोलर सिस्टम के आखिरी region कि जिसे astronomers Oort cloud कहते हैं। यह भी लगभग पूरी तरह ice Comets and frozen gases से मिलकर बना है। Oort cloud को आप हमारे सोलर सिस्टम की आखिरी last boundary भी कह सकते हैं। जो scattered disc के बाद शुरू होती है और astronomers के मुताबिक इसका आखरी edge करीब 0.08 light years पर है।
अभी तक मैंने आपको जो भी बताया वह सभी ऑब्जेक्ट मिलकर हमारा एक सोलर सिस्टम कहलाते हैं। जिसमें हमारा star sun सबसे massive और ज़्यदा gravity वाला ऑब्जेक्ट है। जिसकी ग्रेविटी के कारण solar system के सभी दूसरे ऑब्जेक्ट्स उसे ऑर्बिट करते हैं। यानी अपने सोलर सिस्टम के निर्माण को समझने के लिए हमें अपने सोलर सिस्टम में मौजूद सभी ऑब्जेक्ट्स के निर्माण को अच्छे से समझना होगा।

How Solar System Was Formed
तो चलिए अब आते हैं अपने मेन सवाल पर कि आखिर कैसे हमारे सोलर सिस्टम का जन्म हुआ था?
दोस्तों 1755 मे सोलर सिस्टम के निर्माण को समझने के लिए German philosopher Immanuel Kant ने Nebular hypothesis दी। Nebular hypothesis आज के समय में सोलर सिस्टम के formation and evolution को समझाने वाली सबसे best hypothesis मानी जाती है। जो scientific community मे भी widely accepted है।
Nebular hypothesis के अनुसार हमारे सोलर सिस्टम का निर्माण आज से करीब 4.571 billion years पहले एक बड़े stellar Nebula cloud से हुआ था। जिसे Nebular hypothesis मे Solar Nebula का नाम दिया गया है।
इस Solar Nebula का 75% भाग हाइड्रोजन और करीब 23% भाग हीलियम से बना था। जिसमें करीब 2% दूसरे elements and compound जैसे organic molecules, hydrocarbons silicas, various forms of volatile substance like water and methane मौजूद थे। यूनिवर्स में मौजूद करीब 90% star systems का निर्माण इसी तरह के Nebula clouds से होता है।
वैसे तो Nebula clouds काफी dense होते है। और atomic level पर होने के कारण यह काफ़ी gravitational unstable भी होते हैं। जिसका मतलब है यह लगातार Moving stage में रहते हैं और एक दूसरे से interact करते रहते हैं। जिसके कारण यह समय के साथ अपने आसपास मौजूद gases को भी collect करते रहते हैं और अपना आकार बढ़ाते रहते हैं। पर nebular cloud से एक Star की formation के लिए एक key moment की जरूरत होती है।

और हमारे Solar Nebula के लिए वह key moment आज से करीब 4.603 billion इयर्स पहले हुआ एक Supernova explosion था। इस एक्सप्लोजन से निकलने वाली gravitational waves ने हमारी 65 light years मे फैली Solar Nebula को collapse करने पर मजबूर कर दिया। जिसके बाद यह Solar Nebula काफी तेजी से rotate करने लगी। इस दौरान Nebula cloud के इतनी तेजी से रोटेट करने के चलते। angular momentum ने अपना काम करना शुरू किया और Nebula cloud मैं मौजूद gas particles space मे wide range मे फैल गए।
जिससे एक बड़ी disc form हुई। इसे Accretion disc कहा जाता है। जिसके बाद इस disc मैं मौजूद गैस पार्टिकल्स धीरे-धीरे Accretion disc के सेंटर में जमा होने लगे। इसके बाद समय के साथ center मैं और भी gas पार्टिकल्स कट्टा हुए और Accretion disc के सेंटर का Mass और ग्रेविटी बढ़ने लगी ।
इस तरह ही यह process कई लाख सालों तक चलता रहा। जिससे Accretion disc के सेंटर में एक densely hydrogen and helium से बने ऑब्जेक्ट का निर्माण हुआ। जिसे Nebular hypothesis मे protosun का नाम दिया गया है । इसे आप हमारे sun की सीड यानि बीज भी कह सकते है। क्योंकि यही Accretion disc मैं बनने वाला पहला object था। जिससे हमारे मौजूदा sun का निर्माण हुआ है।
जिसके बाद protosun के चारों ओर Accretion disc मैं मौजूद gases इस protosun कि gravity के कारण और भी तेजी से इसकी ओर अट्रैक्ट होने लगी। और धीरे-धीरे protosun एक बड़े ऑब्जेक्ट की शक्ल लेने लगा। अब protosun के आकार के साथ-साथ उसका temperature and density भी बढ़ते जा रहे थे जिसके कारण अब यह थोड़ा चमकने लगा था।
पर अभी भी इसके core का temperature and pressure इतना ज्यादा नहीं हुआ था। कि उसमें nuclear fusion हो सके बल्कि यह चमक तो gravitational compression के कारण बन रही थी जो Accretion disc के protosun से टकराते हुए और गैस के तेजी से घूमते हुए आपस मे इंटरेक्ट करने के कारण पैदा हो रही थी।

इस समय तक भी protosun अपनी बढ़ती ग्रेविटी के कारण Accretion disc मैं मौजूद gases को centre की और खींचता रहता है और अपने total mass को बढ़ाता रहता है। इसके इस process में gas particles के आपस में टकराने से पैदा होने वाली heat को infrared spectrum मैं देखा जा सकता है। और जब protosun का mass हमारे मौजूदा Jupiter planet के mass से 13 times ज्यादा हो गया तब इसकी 2nd स्टेज स्टार्ट होती है।
अब यह protosun नहीं बल्कि एक brown dwarf star है। जिसके कोर मे अब इतना pressure and temperature हो चुका है कि इसमें मौजूद deuterium atoms मे अब fusion reaction शुरू हो चुकी होगी। deuterium hydrogen atom का एक stable isotope है। जिसे fuse होने के लिये hydrogen से कम pressure और heat की जरुरत होती है। इस समय तक हमारा sun अब visible light भी निकालना शुरू कर देगा। यानी इस स्टेज में brown dwarf sun को simple telescope से भी देखा जा सकता था।
पर अभी भी यह हमारे मौजूदा sun की तरह एक G type main sequence star नहीं था। और ना ही यह हमारे sun के जितना massive था। कि इसके अंदर hydrogen fusion reaction हो सके। पर इस समय भी यह लगातार अपने चारों ओर मौजूद Accretion disc के मैटर को लगातार consume कर रहा था और और भी ज्यादा बढ़ा और massive हो रहा था। जिसके बाद एक स्टेज आई। जब हमारे sun का Mass बढ़कर Jupiter से 80 गुना तक हो गया।
जिसके बाद अब हमारे sun का mass इतना हो चुका था। कि अब इसके core में इतना अधिक pressure and heat generate होने लगी कि अब हमारे sun के core में मौजूद hydrogen atoms भी fuse होने लगे और Helium nucleus में बदलने लगे । यानी यह वह समय था जब हमारे sun में आज की तरह proper hydrogen nuclear fusion reaction होने लगी थी।
और अब हमारा sun एक new born main sequence star था। पर अभी भी इसका आकार काफी ज्यादा छोटा था जिसके बाद यह इसी तरह करीब 10 million years तक रहा। और अपने चारों ओर मौजूद matter को collect करके अपना आकार बढ़ाता रहा। और एक समय ऐसा आया जब हमारे sun के करीब मौजूद Accretion disc मैं ज्यादा मैटर नहीं बचा था। और Accretion disc का बचा हुआ मैटर sun को काफी दूरी पर से orbit कर रहा था।
जिसके कारण अब हमारे sun का आकार बढ़ना बंद हो गया और अब यह अपने मौजूदा आकार जितना बड़ा हो चुका था। समय के साथ इसके कोर में होने वाली न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्शन में भी वृद्धि आई। जिसके कारण इससे निकलने वाले high solar स्टॉर्म और outward pressure के कारण Accretion disc का बचा हुआ matter इससे और भी ज़्यदा दूरी पर चला गया।
जिसके कारण अब हमारे newborn sun के चारों ओर के गैसियस क्लाउड्स completely clear हो गए और अब यह fully visible था। पर अभी भी इसके चारों और कोई दूसरा celestial object मौजूद नहीं था। बस इससे अलग अलग astronomical unit दुरीयों पर Accretion disc के कुछ clouds इसे orbit कर रहे थे।
इसे हमारे sun का t-tauri phase कहा जाता है। इस तरह के कई new Bornstar हबल टेलीस्कोप भी खोज चुका है। sun का t-tauri phase करीब 10 million years तक चला। और इसी दौरान हमारे सोलर सिस्टम में मौजूद planets और दूसरे celestial objects का निर्माण हुआ।

Sun T-Tauri Phase
चलिए sun के इस t-tauri phase को थोड़ा अच्छे से समझते हैं।
t-tauri phase एक ऐसा समय होता है जिसमें किसी स्टार के चारों ओर Orbit मे मौजूद Accretion disc के बचे हुए क्लाउड्स से planet’s moons and asteroids का निर्माण होता है। यह t-tauri phase 10 million ईयर्स तक चलता है।
हमारे newborn sun के t-tauri phase की शुरुआत में new born sun से निकलने वाले heat and light radiation से इसके चारों ओर घूम रही। Accretion disc मे मौजूद water and methane vaporized होकर disc के ठंडे outer region मैं चले गए ।
अब t-tauri phase जैसे बढ़ रहा था वैसे ही हमारे newborn sun के चारों ओर ऑर्बिट कर रहे gaseous clouds का टेंपरेचर भी धीरे धीरे कम हो रहा था। जिसके बाद अब इस Accretion disc मैं मौजूद less volatile substance जैसे silicate, iron और दूसरे हैवी elements भारी crystal dust grains मैं बदलने लगे। और जैसे-जैसे इनकी संख्या बढ़ने लगी।
तो Gravity ने भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। और अब यह अपने चारों ओर मौजूद particles को भी अट्रैक्ट करने लगे और इनका आकार धीरे-धीरे बढ़ने लगा। जिसके बाद sun के चारों ओर ऑर्बिट करते हुए इस तरह के dust grains clumps ने और भी कई clumps को आपस में जोड़ा। और इस तरह ये छोटे-छोटे dust particles sun के चारों ओर ऑर्बिट करते हुए। अपने gaseous cloud से पार्टिकल्स को जोड़ते रहे और अपना आकार बढ़ाते रहें।
इस दौरान इनके बढ़ने का Rate करीब 1cm per year था। इसी तरह after a million years ये छोटे डस्ट पार्टिकल्स अब कई किलोमीटर बड़े large chunks मैं बदल गए। जिन्हें planetesimals कहा जाता है। इसे आप Rocky planets यानी चट्टानी ग्रहो। की primary body कह सकते हैं। इसी से Rocky planets का निर्माण होता है और हमारी पृथ्वी का निर्माण भी इसी से हुआ है।
इसके बाद planetesimals ऑब्जेक्ट Gravity के कारण अपने चारों ओर मौजूद दूसरे matter को काफी तेजी से अट्रैक्ट करता है। और यह प्रोसेस 1 से 2 लाख सालों तक चलता है। जिसके बाद हमें हमारे sun के चारों ओर अलग-अलग orbit मे घूमती हुई। कई Universal body दिखाई देती है जिनका diameter कई हजार kilometre तक फैला होता है।
अब बनने वाले इन Universal objects को scientist planetary embryo कहते है। पर अभी भी इन planetary embryo का sun के around Orbit stable नहीं था। जिसके बाद कई planetary embryos आपस में टकरातई। जिसमें enormous amount of heat पैदा हुई । और कई प्लैनेट्स को अपने Moon’s मिले। और कई वैज्ञानिकों की मानें तो हमारी पृथ्वी को भी इसी तरह उसका moon मिला था।

अब इन planetary embryos ने मिलकर कई बड़े प्लेनेट का निर्माण किया । और समय के साथ इनका sun के अराउंड ऑर्बिट भी स्टेबल होता गया । और समय के साथ इनकी सरफेस पर मौजूद heavier elements ग्रेविटी के कारण इनके कोर की ओर खींचते चले गए। जिससे प्लैनेट्स के पास अलग-अलग density वाली layers का निर्माण हुआ।
इसी तरह हमारे सोलर सिस्टम में sun के चारों ओर घूमते आज के Rocky planets Earth, venues, Mars and mercury का जन्म हुआ था। वैसे Earth के जन्म को लेकर हम इससे आगे भी थोड़ा डिटेल में बात करेंगे पर अभी के लिए अब आते हैं। सोलर सिस्टम के बचे हुए प्लैनेट्स Jupiter, Saturn, Uranus और Neptune के निर्माण पर
तो जैसा कि मैंने आपको बताया था की Solar Nebula जिससे हमारे solar system का निर्माण हुआ था उसका करीब 98 प्रतिशत भाग तो हाइड्रोजन एंड हीलियम जैसे पार्टी कल से ही मिलकर बना था और बचे हुए 2% मैं ही सिलिकेट और दूसरे हैवी मैटेरियल्स मौजूद थे जिनसे रॉकी प्लैनेट्स का जन्म हुआ। इसलिए अब हमारे newborn sun के चारों ओर बची Accretion disc में अब ज्यादातर हाइड्रोजन एंड हिलियम गैस पार्टिकल्स ही बचे थे।
जो t-tauri phase के दौरान हमारे newborn sun से निकलने वाले heat and radiation के चलते sun से काफी दूर हो गए थे। पर जैसे-जैसे हमारे sun का t-taur phase आगे बढ़ता रहा वैसे ही यह hydrogen and Helium particles भी समय के साथ करीब आते गए और Jupiter and Saturn जैसे gas giants के planetary embryos का निर्माण हुआ। जिसके बाद इनकी ग्रेविटी के कारण और भी तेजी से यह अपने आसपास के हाइड्रोजन एंड हीलियम को अपने अंदर खींचने लगे।
और तेजी से अपने आकार को बड़ा करते चले गए। और क्योंकि इस समय तक भी Accretion disc में काफी ज्यादा हाइड्रोजन एंड हिलियम मौजूद थी। इसी वजह से इनका आकार sun को orbit करने वाले रॉकी प्लैनेट्स से कई गुना ज्यादा बड़ा हो गया।
और इस तरह जन्म हुआ हमारे सोलर सिस्टम में मौजूद Jupiter and Saturn planet का जिनकी composition मैं करीब 99% हाइड्रोजन एंड हिलियम गैस ही मौजूद है ।
इसी दौरान accretion disc के आउटर हिस्से में मौजूद water vapours जो sun के हिट एंड रेडिएशन के कारण sun से काफी दूर जा चुकी थी अब वह भी समय के साथ condense होने लगी और और इन्होंने भी मिलकर कई Icy planetary embryos का निर्माण किया।
जिसके बाद इन Icy planetary embryos ने भी accretion disc के outer region मे बचे हुए दूसरे Icy, methane और वाटर पार्टिकल्स को ग्रेविटी के कारण अट्रैक्ट किया। और यह process यूं ही कुछ लाख साल चला। जिसके बाद हमें हमारे सोलर सिस्टम के आखिरी में मौजूद दो ice Giant planet Uranus and Neptune मिले।

Formation of Moons of Solar System Planets
अब बात करते है। solar system मे मौजूद planet के Moon’s के formation की।
तो यूनिवर्स मे प्लेनेट के Moon’s का निर्माण 3 कारणों से होता है। और हमारे सोलर सिस्टम में मौजूद Moon’s का निर्माण भी इन्हीं तीन कारणों से हुआ है।
इसमें सबसे पहला तरीका है कि जब किसी प्लेनेट का निर्माण होता है तो उसके निर्माण के बाद उसके चारों ओर बची accretion disc का matter समय के साथ उसी प्लेनेट के चारों और ऑर्बिट करने लगता है और इसमें मौजूद पार्टिकल्स ग्रेविटी के कारण एक-दूसरे की ओर अट्रैक्ट होते रहते हैं और कुछ लाख साल बाद यह एक solid celestial body का रूप ले लेते हैं जिसे हम प्लैनेट्स के Moon’s कहते हैं। हमारे सोलर सिस्टम में मौजूद ज्यादातर gas giants के Moon’s का निर्माण इसी तरह से हुआ था ।
इसके बाद दूसरा तरीका planet की gravity पर निर्भर करता है। इसमें कई बार प्लेनेट अपनी ग्रेविटी के कारण अपने आसपास मौजूद किसी दूसरे ऑब्जेक्ट या फिर एस्ट्रॉयड को अपने ऑर्बिट में खींच लेता है जिसे बाद में उस प्लेनेट का moon कहा जाता है। हमारे सोलर सिस्टम में मौजूद नेपच्यून और मंगल ग्रह के Moon’s के बारे में भी वैज्ञानिक यही कहते हैं कि Mars के दोनों Moon’s और Neptune के कई Moon’s का निर्माण इन के साथ नहीं हुआ था बल्कि यह बाद में इन प्लैनेट्स की ग्रेविटी में आकर फ़स गए। और इन्हें ऑर्बिट करने लगे।
किसी प्लेनेट के नेचुरल Moon के बनने का सबसे आखरी तरीका है। दो celestial bodies की टक्कर। क्युकी जब किसी प्लेनेट से किसी बड़े एस्टेरोइड या दूसरे प्लेनेट की टक्कर हो जाए तो उससे भी प्लेनेट के चारों और काफी ज्यादा मात्रा में मैटर पहुंच जाता है जो समय के साथ बाद में प्लेनेट के चारों ओर घूमते हुए एक big universal object में बदल जाता है। इस तरह से Moon का निर्माण होना काफी ज्यादा rare होता है। पर पृथ्वी के Moon का निर्माण आज से 4 बिलीयन साल पहले एक प्लेनेट की टक्कर के चलते ही हुआ था।
तो इसी तरह हमारा sun करीब 10 मिलीयन ईयर्स तक अपने t-tauri phase मैं रहा। और इस दौरान हमारे सोलर सिस्टम का निर्माण लगभग पूरा हो चुका था। अब यह कुछ इस तरह का दिखने लगा था जैसा यह आज है हमारे सोलर सिस्टम में लगभग सभी प्लैनेट्स का निर्माण पूरी तरह से हो चुका था कुछ Moon’s का निर्माण अभी भी चल रहा था पर अब प्लैनेट्स का निर्माण बंद हो गया था। जिसके बाद बचे हुए accretion disc ने अलग-अलग दूरियों पर kupar बेल्ट, scattered belt, और outer belt का रूप ले लिया




